1.52.12Rigved
श्लोक:१.५२.१२ (1.52.12)सूक्त (५२)

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श्लोक:१.५२.१२ (1.52.12)सूक्त (५२)

त्वम॒स्य पा॒रे रज॑सो॒ व्यो॑मनः॒ स्वभू॑त्योजा॒ अव॑से धृषन्मनः । च॒कृ॒षे भूमिं॑ प्रति॒मान॒मोज॑सो॒ऽपः स्वः॑ परि॒भूरे॒ष्या दिव॑म् ॥ (१२)

हे शत्रुनाशक इंद्र! तुमने इस व्यापक आकाश के ऊपर रहते हुए अपनी शक्ति से हमारी रक्षा करने के निमित्त भूलोक का निर्माण किया है. तुम बल की अंतिम सीमा हो. तुमने सुखपूर्वक गमन करने योग्य आकाश एवं स्वर्ग को व्याप्त कर लिया है. (१२)

O enemies Indra! You have built a bhulok to protect us with your power while living above this vast sky. You are the ultimate limit of force. You have gladly permeated the moving sky and heaven. (12)