Sanskrit

पु॒रूणि॒ हि त्वा॒ सव॑ना॒ जना॑नां॒ ब्रह्मा॑णि॒ मन्द॑न्गृण॒तामृषी॑णाम् । इ॒मामा॒घोष॒न्नव॑सा॒ सहू॑तिं ति॒रो विश्वा॒ँ अर्च॑तो याह्य॒र्वाङ् ॥ (१६)

Hindi

हे इंद्र! यजमानों के बहुत से यज्ञ एवं स्तुति करते हुए ऋषियों की स्तुतियां तुम्हें प्रसन्न करती हैं. तुम इस स्तुति को शोभायुर्त बताते हुए अन्य सब स्तुतिकर्ताओं का तिरस्कार करो एवं रक्षासाधनों के साथ मेरे सामने स्थित होओ. (१६)

English

O Indra! The praises of the sages please you by performing many yagnas and praises of the hosts. You should despise all other praisers, calling this praise a decoration and be before me with the means of defense. (16)