3.18.1Rigved
श्लोक:३.१८.१ (3.18.1)सूक्त (१८)

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श्लोक:३.१८.१ (3.18.1)सूक्त (१८)

भवा॑ नो अग्ने सु॒मना॒ उपे॑तौ॒ सखे॑व॒ सख्ये॑ पि॒तरे॑व सा॒धुः । पु॒रु॒द्रुहो॒ हि क्षि॒तयो॒ जना॑नां॒ प्रति॑ प्रती॒चीर्द॑हता॒दरा॑तीः ॥ (१)

हे अग्नि! तुम हमारे सामने आकर अनुकूल एवं कर्मसाधक बनो, जिस प्रकार मित्र के प्रति मित्र एवं संतान के प्रति माता-पिता होते हैं. मनुष्य मनुष्यों के द्रोही बने हैं. तुम हमारे विरोधी शत्रुओं को भस्म करो. (१)

O agni! You come before us and be friendly and action-oriented, just as there are friends to friends and children to friends. Humans have become enemies of human beings. You consume our adversary enemies. (1)