1.5.10Samved
मंत्र:१.५.१० (1.5.10)खंड (५)

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मंत्र:१.५.१० (1.5.10)खंड (५)

नि त्वामग्ने मनुर्दधे ज्योतिर्जनाय शश्वते । दीदेथ कण्व ऋतजात उक्षितो यं नमस्यन्ति कृष्टयः ॥ (१०)

हे अग्नि! मननशील मनुष्य आप को धारण करते हैं. अनंत काल से मानव जाति के लिए आप का प्रकाश प्रकाशित है. आप ज्ञानी ऋषियों के आश्रम में प्रकाशित होते हैं. प्रजापति ने यजमान के लिए आप को देव यज्ञ स्थान में स्थापित किया. हम सब आप को नमस्कार करते हैं. (१०)

O agni! Mindful human beings hold you. From eternity the light of you to mankind is illuminated. You are published in the ashram of knowledgeable sages. Prajapati installed you in the Dev Yagya place for the host. We all greet you. (10)