1.6.4Samved
मंत्र:१.६.४ (1.6.4)खंड (६)
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प्र यो राये निनीषति मर्तो यस्ते वसो दाशत् । स वीरं धत्ते अग्न उक्थशँसिनं त्मना सहस्रपोषिणम् ॥ (४)
हे अग्नि! आप व्यापक हैं. हम आप के भक्त धन के लिए आप को प्रसन्न करना चाहते हैं. जो मनुष्य आप को हवि प्रदान करता है, वह स्तुति करने वाले हजारों मनुष्यों का पालनपोषण करने वाले वीर पुत्र को प्राप्त करता है. (४)
O agni! You are comprehensive. We want to please you for your devotee wealth. The man who gives you the glory receives the heroic Son who nurtures thousands of men who praise him. (4)