1.3.8Atharvaved
मंत्र:१.३.८ (1.3.8)सूक्त (३)
Shlok 1 of 1
विषि॑तं ते वस्तिबि॒लं स॑मु॒द्रस्यो॑द॒धेरि॑व । ए॒वा ते॒ मूत्रं॑ मुच्यतां ब॒हिर्बालिति॑ सर्व॒कम् ॥ (८)
हे मूत्र रोग से दुःखी रोगी! जिस प्रकार सागर, जलाशय आदि का जल निकलने के लिए मार्ग बना दिया जाता है, उसी प्रकार मैं ने तेरे रुके हुए मूत्र को बाहर निकालने के लिए तेरे मूत्राशय का द्वार खोल दिया है. तेरा सारा मूत्र शब्द करता हुआ बाहर निकले. (८)
O patient suffering from urinary disease! Just as the water of the ocean, reservoir, etc. is made a way to come out, so I have opened the door of your bladder to take out your stagnant urine. All your urine came out saying words. (8)