1.3.9Atharvaved
मंत्र:१.३.९ (1.3.9)सूक्त (३)

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मंत्र:१.३.९ (1.3.9)सूक्त (३)

यथे॑षु॒का प॒राप॑त॒दव॑सृ॒ष्टाधि॒ धन्व॑नः । ए॒वा ते॒ मूत्रं॑ मुच्यतां बहि॒र्बालिति॑ सर्व॒कम् ॥ (९)

जैसे खिंची हुई डोरी वाले धनुष से छोड़ा हुआ बाण तेजी से लक्ष्य की ओर जाता है, वैसे तेरा रुका हुआ सारा मूत्र शब्द करता हुआ बाहर निकले. (९)

Just as the arrow left from the bow with a stretched cord rapidly moves towards the target, so all your stalled urine comes out saying words. (9)