1.5.3Atharvaved
मंत्र:१.५.३ (1.5.3)सूक्त (५)

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मंत्र:१.५.३ (1.5.3)सूक्त (५)

तस्मा॒ अरं॑ गमाम वो॒ यस्य॒ क्षया॑य॒ जिन्व॑थ । आपो॑ ज॒नय॑था च नः ॥ (३)

हे जल! हम जिस अन्न आदि को पा कर तृप्त होते हैं, उसे प्राप्त करने के लिए हम आप को पर्याप्त रूप में पाएं. हे जल! आप पर्याप्त रूप में आ कर हमें तृप्त करें. (३)

O water! We get enough of you to get the food etc. we get. O water! You come in sufficient form and satisfy us. (3)