10.3.1Atharvaved
मंत्र:१०.३.१ (10.3.1)सूक्त (३)
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अ॒यं मे॑ वर॒णो म॒णिः स॑पत्न॒क्षय॑णो॒ वृषा॑ । ते॒ना र॑भस्व॒ त्वं शत्रू॒न्प्र मृ॑णीहि दुरस्य॒तः ॥ (१)
यह मेरी वरण वृक्ष की मणि शत्रुओं का नाश करने वाली और अभिलाषा पूरक है. इसे धारण कर के तू उद्योग कर और दुष्टता करने वाले शत्रुओं का विनाश कर. (१)
This gem of my varan tree destroys enemies and complements desire. By wearing it, you do industry and destroy the enemies who do evil. (1)