10.3.9Atharvaved
मंत्र:१०.३.९ (10.3.9)सूक्त (३)
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व॑र॒णेन॒ प्रव्य॑थिता॒ भ्रातृ॑व्या मे॒ सब॑न्धवः । अ॒सूर्तं॒ रजो॒ अप्य॑गु॒स्ते य॑न्त्वध॒मं तमः॑ ॥ (९)
मेरे जो बांधव एवं भतीजे मुझ से शत्रुता रखते हैं, वे वरण वृक्ष से निर्मित इस मणि के प्रभाव से व्यथित हों. वे कष्टदायिनी धूल को प्राप्त हों तथा घने अंधकार में प्रवेश करें. (९)
My brothers and nephews who are hostile to me should be distressed by the effect of this gem made of varan tree. They should get the painful dust and enter the dense darkness. (9)