10.6.1Atharvaved
मंत्र:१०.६.१ (10.6.1)सूक्त (६)

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मंत्र:१०.६.१ (10.6.1)सूक्त (६)

अराती॒योर्भ्रातृ॑व्यस्य दु॒र्हार्दो॑ द्विष॒तः शिरः॑ । अपि॑ वृश्चा॒म्योज॑सा ॥ (१)

बंधुओं में जो मेरा शत्रु, दुष्ट हृदय वाला और द्वेष करने वाला है, उस का शीश भी मैं वेग से तोड़ता हूं. (१)

I also break the head of the one who is my enemy, evil-hearted and hater among the brothers. (1)