11.4.5Atharvaved
मंत्र:११.४.५ (11.4.5)सूक्त (४)

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मंत्र:११.४.५ (11.4.5)सूक्त (४)

तत॑श्चैनम॒न्यया॑ जि॒ह्वया॒ प्राशी॒र्यया॑ चै॒तं पूर्व॒ ऋष॑यः॒ प्राश्न॑न् । जि॒ह्वा ते॑ मरिष्य॒तीत्ये॑नमाह । तं वा अ॒हं ना॒र्वाञ्चं॒ न परा॑ञ्चं॒ न प्र॒त्यञ्च॑म् । अ॒ग्नेर्जि॒ह्वया॑ । तयै॑नं॒ प्राशि॑षं॒ तयै॑नमजीगमम् । ए॒ष वा ओ॑द॒नः सर्वा॑ङ्गः॒ सर्व॑परुः॒ सर्व॑तनूः । सर्वा॑ङ्ग ए॒व सर्व॑परुः॒ सर्व॑तनूः॒ सं भ॑वति॒ य ए॒वं वेद॑ ॥ (५)

"हे देवदत्त! पूर्ववर्ती अनुष्ठान कर्ता ऋषियों ने जिस जीभ की ओर से इस ब्रह्मौदन को खाया है, तुम ने यदि उस से भिन्न उस की जीभ की ओर से खाया तो तुम्हारी जीभ मर जाएगी अर्थात्‌ तुम गूंगे हो जाओगे'- गुरु अपने शिष्य से इस प्रकार कहे. शिष्य कहे कि मैं ने इस ओदन को न पराङ्मुख हो कर खाया और न सामने से खाया और न आत्माभिमुख हो कर खाया. मैं ने इसे अग्नि की जीभ से खाया है. मैं ने इसे वहीं पहुंचा दिया है, जहां इसे पहुंचना चाहिए था. यह ओदन समस्त अंगों सहित, सभी जोड़ों सहित और संपूर्ण शरीर वाला है. इस विधि से जो इस ओदन को खाना जानता है, वही सब अंगों से युक्ता, पूरे जोड़ों सहित एवं संपूर्ण शरीर वाला होता है. (५)