11.5.10Atharvaved
मंत्र:११.५.१० (11.5.10)सूक्त (५)

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मंत्र:११.५.१० (11.5.10)सूक्त (५)

तत॑श्चैनम॒न्येनोर॑सा॒ प्राशी॒र्येन॑ चै॒तं पूर्व॒ ऋष॑यः॒ प्राश्न॑न् । कृ॒ष्या न रा॑त्स्य॒सीत्ये॑नमाह । तं वा॑ अ॒हं ना॒र्वाञ्चं॒ न परा॑ञ्चं॒ न प्र॒त्यञ्च॑म् । पृ॑थि॒व्योर॑सा । तेनै॑नं॒ प्राशि॑षं॒ तेनै॑नमजीगमम् । ए॒ष वा ओ॑द॒नः सर्वा॑ङ्गः॒ सर्व॑परुः॒ सर्व॑तनूः । सर्वा॑ङ्ग ए॒व सर्व॑परुः॒ सर्व॑तनूः॒ सं भ॑वति॒ य ए॒वं वेद॑ ॥ (१०)

गुरु अपने शिष्य से इस प्रकार कहे-'हे देवदत्त! पूर्ववर्ती अनुष्ठानकर्तता ऋषियों ने जिस वक्षस्थल से इस ओदन का सेवन किया था, तुम ने उस से भिन्न पृष्ठ से यदि इस ओदन का सेवन किया तो तुम्हें ऋषि कार्य में सफलता प्राप्त नहीं होगी.' इस के उत्तर के रूप में शिष्य अपने गुरु से निवेदन करे कि मैंने इस ओदन का सेवन न पराङ्मुख हो कर किया है, न सामने से किया है और न आत्माभिमुख हो कर किया है. मैं ने पृथ्वी रूप वक्षस्थल से इस ओदन का सेवन किया है. इसे जहां जाना चाहिए था मैं ने उसे वहीं पहुंचा दिया है. यह ओदन सभी अंगों से युक्त, सभी जोड़ों सहित और संपूर्ण शरीरवाला है. इस विधि से जो उस ओदन का सेवन करना जानता है, वह समस्त अंगों वाला सभी जोड़ों वाला संपूर्ण शरीर वाला तथा सर्वांगफल से युक्त हो कर स्वर्ग आदि पुण्य लोकों में स्थित होता है. (१०)

The Guru said to his disciple thus- 'O Devdatta! If you consume this odan from a different page than the chest from which the previous ritual duty sages had consumed this odan, then you will not get success in sage work. It has not been done from the front, nor by the spirit. I have consumed this odan from the chest in the form of the earth. I have taken it where it should have gone. This omen is full of all organs, including all joints and full body. By this method, the one who knows how to consume that odan, he is full-bodied with all the joints with all the organs and is situated in the virtuous worlds like heaven etc. (10)