11.5.7Atharvaved
मंत्र:११.५.७ (11.5.7)सूक्त (५)

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मंत्र:११.५.७ (11.5.7)सूक्त (५)

तत॑श्चैनम॒न्यैः प्रा॑णापा॒नैः प्राशी॒र्यैश्चै॒तं पूर्व॒ ऋष॑यः॒ प्राश्न॑न् । प्रा॑णापा॒नास्त्वा॑ हास्य॒न्तीत्ये॑नमाह । तं वा अ॒हं ना॒र्वाञ्चं॒ न परा॑ञ्चं॒ न प्र॒त्यञ्च॑म् । स॑प्तऋ॒षिभिः॑ प्राणापा॒नैः । तै॑रेनं॒ प्राशि॑षं तैरेनमजीगमम् । ए॒ष वा ओ॑द॒नः सर्वा॑ङ्गः॒ सर्व॑परुः॒ सर्व॑तनूः । सर्वा॑ङ्ग ए॒व सर्व॑परुः॒ सर्व॑तनूः॒ सं भ॑वति॒ य ए॒वं वेद॑ ॥ (७)

गुरु अपने शिष्य से इस प्रकार कहे-हे देवदत्त! पूर्ववर्ती अनुष्ठानकर्ता ऋषियों ने जिन प्राण और अपनों की सहायता से ओदन का सेवन किया था, तुम ने यदि उस से भिन्न अर्थात्‌ लौकिक प्राण और अपनों की सहायता से इस ओदन का सेवन किया तो तुम्हारे प्राण और रूप वायु तुम्हारा त्याग कर देंगे. इस के उत्तर के रूप में शिष्य अपने गुरु से कहे कि मैंने इस का सेवन अभिमुख, पराङ्मुख और आत्माभिमुख हो कर किया है. मैंने इस ओदन का सेवन सप्तर्षि रूप प्राण और अपान वायुओं की सहायता से किया है इस प्रकार सेवन किया हुआ होदन संपूर्ण शरीर वाला होता है मैने इसे वहीं पहुंचा दिया है, जहां इसे जाना चाहिए था. इस प्रकार सेवन किया हुआ ओदन मनचाहा फल देने वाला होता है. इस विधि से जो इस ओदन का सेवन करता है, वही समस्त अंगों वाला, सभी जोड़ों सहित एवं संपूर्ण शरीर वाला है. (७)

The Guru said to his disciple in this way: O Devdutt! If you consume odan with the help of your own soul and loved ones, with the help of your cosmic soul and loved ones, then your soul and form air will renounce you. As an answer to this, the disciple should tell his guru that I have consumed it with orientation, alien-oriented and soul-oriented. I have consumed this odan with the help of saptarshi form prana and apana air, thus the hotan consumed is full body, I have delivered it where it should have gone. Thus, the odan consumed is the desired fruit. By this method, the one who consumes this odan is the one with all the organs, with all the joints and the whole body. (7)