11.5.8Atharvaved
मंत्र:११.५.८ (11.5.8)सूक्त (५)

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मंत्र:११.५.८ (11.5.8)सूक्त (५)

तत॑श्चैनम॒न्येन॒ व्यच॑सा॒ प्राशी॒र्येन॑ चै॒तं पूर्व॒ ऋष॑यः॒ प्राश्न॑न् । रा॑जय॒क्ष्मस्त्वा॑ हनिष्य॒तीत्ये॑नमाह । तं वा अ॒हं ना॒र्वाञ्चं॒ न परा॑ञ्चं॒ न प्र॒त्यञ्च॑म् । अ॒न्तरि॑क्षेण॒ व्यच॑सा । तेनै॑नं॒ प्राशि॑षं॒ तेनै॑नमजीगमम् । ए॒ष वा ओ॑द॒नः सर्वा॑ङ्गः॒ सर्व॑परुः॒ सर्व॑तनूः । सर्वा॑ङ्ग ए॒व सर्व॑परुः॒ सर्व॑तनूः॒ सं भ॑वति॒ य ए॒वं वेद॑ ॥ (८)

गुरु अपने शिष्य से इस प्रकार कहे-'हे देवदत्त! पूर्ववर्ती अनुष्ठानकर्ता ऋषियों ने जिस विधि से इस ओदन का सेवन किया था, उस के अतिरिक्त यदि किसी अन्य लौकिक विधि से तुम ने इस ओदन का सेवन किया तो राजयक्ष्मा रोग तुम्हारा विनाश कर देगा.' इस के उत्तर के रूप में शिष्य गुरु से कहे, कि मैं ने इस ओदन का सेवन न पराङ्मुख हो कर किया है, न सामने से किया है और न आत्माभिमुख हो कर किया है. मैंने इस ओदन का सेवन अंतरिक्ष विधि से किया है. इस विधि से सेवन किया हुआ ओदन सर्वांग पूर्ण हो जाता है. जो पुरुष इस प्रकार से ओदन का सेवन करना जानता है वह सर्वाग पूर्ण फल को प्राप्त करता है. (८)

The Guru said to his disciple thus- 'O Devdatta! Apart from the method by which the previous ritualists consumed this odan, if you consume this odan by any other cosmic method, then the corona disease will destroy you. It has not been done from the front, nor by the spirit. I have consumed this odan with space method. With this method, the odan consumed is completed. The man who knows how to consume odan in this way gets the full fruit. (8)