18.3.8Atharvaved
मंत्र:१८.३.८ (18.3.8)सूक्त (३)

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मंत्र:१८.३.८ (18.3.8)सूक्त (३)

उत्ति॑ष्ठ॒प्रेहि॒ प्र द्र॒वौकः॑ कृणुष्व सलि॒ले स॒धस्थे॑ । तत्र॒ त्वं पि॒तृभिः॑संविदा॒नः सं सोमे॑न॒ मद॑स्व॒ सं स्व॒धाभिः॑ ॥ (८)

हे प्रेत! तू इस स्थान से उठ और चल. शीघ्रता से चलता हुआ तू अंतरिक्ष को अपना निवास स्थान बना तथा पितरों से मिल कर सोमरस का पान करता हुआ हर्षित हो. (८)

O ghost! You get up from this place and walk. Moving fast, you make space your abode and be happy to meet your ancestors and drink Someras. (8)