4.5.7Atharvaved
मंत्र:४.५.७ (4.5.7)सूक्त (५)
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स्वप्न॑ स्वप्नाभि॒कर॑णेन॒ सर्वं॒ नि ष्वा॑पया॒ जन॑म् । ओ॑त्सू॒र्यम॒न्यान्त्स्वा॒पया॑व्यु॒षं जा॑गृताद॒हमिन्द्र॑ इ॒वारि॑ष्टो॒ अक्षि॑तः ॥ (७)
हे स्वप्न के देव! शय्या आदि पर सोने वाले इन जनों को तथा अन्य व्यक्तियों को सूर्योदय तक निद्रा मग्न रखो. सब के सो जाने पर हिंसा और क्षय से रहित हो कर इंद्र के समान मैं भोग में संलग्न रहूं एवं जागरण करूं. (७)
O God of dreams! Keep these people sleeping on bed etc. and other people sleeping till sunrise. When everyone falls asleep, without violence and decay, I should engage in enjoyment and awaken like Indra. (7)