6.5.2Atharvaved
मंत्र:६.५.२ (6.5.2)सूक्त (५)

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मंत्र:६.५.२ (6.5.2)सूक्त (५)

इन्द्रे॒मं प्र॑त॒रं कृ॑धि सजा॒ताना॑मसद्व॒शी । रा॒यस्पोषे॑ण॒ सं सृ॑ज जी॒वात॑वे ज॒रसे॑ नय ॥ (२)

हे इंद्र! इस यजमान की अतिशय वृद्धि करो. तुम्हारी कृपा से यह अपने बंधुओं के मध्य सब को वश में करने वाला तथा स्वयं स्वतंत्र बने. तुम इसे धन संपन्न बनाओ तथा इस के जीवन को वृद्धावस्था तक पहुंचाओ. (२)

O Indra! Increase this host excessively. By your grace, he should become the one who subdues everyone among his brothers and becomes free himself. You make it rich and take its life to old age. (2)