7.8.1Atharvaved
मंत्र:७.८.१ (7.8.1)सूक्त (८)

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मंत्र:७.८.१ (7.8.1)सूक्त (८)

दितेः॑ पु॒त्राणा॒मदि॑तेरकारिष॒मव॑ दे॒वानां॑ बृह॒ताम॑न॒र्मणा॑म् । तेषां॒ हि धाम॑ गभि॒षक्स॑मु॒द्रियं॒ नैना॒न्नम॑सा प॒रो अ॑स्ति॒ कश्च॒न ॥ (१)

मैं दिति के पुत्रों अर्थात्‌ दैत्यों का स्थान छीन कर अदिति के पुत्रों अर्थात्‌ देवों को देता हूं. वे देव गुणों से महान एवं शत्रुओं द्वारा पराजित न होने वाले हैं. उन का सागर अथवा आकाश में स्थित निवास स्थान दूसरों के लिए दुर्जेय और दुर्गम है. इन देवों से महान कोई भी नहीं है. (१)

I take away the place of Diti's sons i.e. demons and give it to Aditi's sons i.e. gods. They are not going to be great by god qualities and defeated by enemies. Their habitat in the ocean or sky is formidable and inaccessible to others. There is no one greater than these gods. (1)